महाभारत के कुरुक्षेत्र से साइबर युग तक, गीता का पुनर्जागरण
मोबाइल स्क्रीन से जाग रहा संस्कार, संतुलन और सामाजिक पुनर्जागरण
विशेष रिपोर्ट-निर्मल अग्रवाल
सरगांव।सुबह की भागदौड़ शुरू होने से पहले एक परिवार के मोबाइल की स्क्रीन पर संस्कृत के श्लोक गूँजते हैं। कुछ किलोमीटर दूर कोई विद्यार्थी अपनी ऑनलाइन कक्षा में उच्चारण सुधार रहा है। किसी दूसरे शहर में कोई गृहिणी घर के कामों के बीच गीता के श्लोक दोहरा रही है और देश से हजारों किलोमीटर दूर कोई प्रवासी भारतीय उसी कक्षा से जुड़कर अपने बच्चों को भारतीय संस्कारों से परिचित करा रहा है।
दृश्य अलग-अलग हैं, लेकिन प्रयास एक है—गीता को जीवन के निकट लाना। यह दृश्य उस समय का है जब दुनिया अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति के साथ-साथ अभूतपूर्व मानसिक और सामाजिक चुनौतियों से भी गुजर रही है। युद्ध और संघर्ष की आशंकाएँ, प्राकृतिक आपदाएँ, सामाजिक तनाव, परिवारों में घटता संवाद और बच्चों-युवाओं के जीवन में बढ़ती डिजिटल निर्भरता—इन सबके बीच आज सबसे बड़ी आवश्यकता शायद सूचना की नहीं, दिशा की है।
पाँच हजार वर्ष पहले कुरुक्षेत्र में अर्जुन भी एक ऐसे ही संकट के बीच खड़े थे। सामने युद्ध था, भीतर द्वंद्व था और निर्णय कठिन था। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध करने का उपदेश नहीं दिया; उन्होंने उन्हें कर्तव्य, विवेक, आत्मसंयम और समत्व की दृष्टि दी।
यही कारण है कि हजारों वर्ष बाद भी गीता का प्रश्न प्रासंगिक है—परिस्थितियाँ कैसी भी हों, मनुष्य अपने भीतर स्थिर कैसे रहे और सही कर्म कैसे करे? इसी प्रश्न के उत्तर की खोज में आज बड़ी संख्या में लोग गीता के अध्ययन की ओर लौट रहे हैं।

विपत्ति से अवसर तक : एक संकल्प जिसने दिशा बदल दी
वर्ष 2020 में जब पूरी दुनिया महामारी के कारण घरों में सिमट गई थी, तब गीता परिवार की वर्षों से चल रही ऑफलाइन गतिविधियों के सामने भी एक बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई। लेकिन इसी संकट ने एक नए प्रयोग का मार्ग खोल दिया।
ऑनलाइन माध्यम से गीता सिखाने का प्रयास आरम्भ हुआ। प्रारंभ में कुछ कक्षाएँ थीं, कुछ साधक थे और तकनीक का नया प्रयोग था। लेकिन धीरे-धीरे यह प्रयोग एक बड़े अभियान में बदलता चला गया।
आज LearnGeeta से विश्व के लगभग 182 देशों के 17 लाख से अधिक साधक जुड़ चुके हैं। अनेक भाषाओं में ऑनलाइन कक्षाएँ संचालित हो रही हैं और प्रतिदिन हजारों साधक शुद्ध संस्कृत उच्चारण के साथ गीता के श्लोकों का अभ्यास करते हैं।
इस यात्रा की विशेषता केवल इसका विस्तार नहीं है। विशेषता यह है कि गीता को कठिन और दूर की वस्तु मानने के बजाय इसे सामान्य परिवार के दैनिक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया गया है। संस्कृत का पूर्व ज्ञान आवश्यक नहीं। कक्षा में श्लोकों का उच्चारण सिखाया जाता है, अभ्यास कराया जाता है और क्रमशः कंठस्थीकरण तथा अर्थ-विवेचन की ओर साधक आगे बढ़ते हैं। इस उपक्रम की यह विशेषता है कि यह सारा प्रकल्प नि:शुल्क चल रहा है।
डिजिटल युग में संस्कारों का नया द्वार
डिजिटल युग की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वही मोबाइल जो बच्चों और युवाओं को अनावश्यक सामग्री की ओर खींच सकता है, वही उन्हें ज्ञान और संस्कार से भी जोड़ सकता है। प्रश्न तकनीक के अस्तित्व का नहीं, उसके उपयोग की दिशा का है।
आज अभिभावकों की एक बड़ी चिंता बच्चों का बढ़ता स्क्रीन-समय है। ऐसे में यदि वही स्क्रीन प्रतिदिन कुछ समय श्लोक-पाठ, चिंतन और जीवन-मूल्यों के अध्ययन का माध्यम बन जाए, तो तकनीक समस्या के साथ समाधान का हिस्सा भी बन सकती है। LearnGeeta के बाल वर्गों और बाल संस्कार केन्द्रों में छोटे-छोटे बच्चों द्वारा संस्कृत श्लोकों का शुद्ध उच्चारण इसी परिवर्तन का एक दृश्य रूप है।
यह केवल किसी पुराने पाठ को याद करना नहीं है। नियमित अभ्यास बच्चों में अनुशासन, एकाग्रता और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ाव का अवसर भी देता है।

श्लोकों से जीवन-दर्शन तक विस्तृत होता क्षितिज
समय के साथ यह अभियान केवल गीता की ऑनलाइन कक्षा नहीं रहा। गीता जयंती महोत्सव, गीता ओलंपियाड, चिंतन सत्र, सामूहिक पारायण, कंठस्थीकरण परीक्षाएँ और विभिन्न विशेष अध्ययन-क्रम इसके विस्तार का हिस्सा बने।
गीता के अध्ययन को क्रमबद्ध बनाने के लिए गीता गुंजन, गीता जिज्ञासु, गीता पाठक, गीता पथिक, गीता व्रती और गीता विचक्षण जैसे विभिन्न स्तर विकसित किए गए। इससे साधक केवल श्लोक पढ़ने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अभ्यास और कंठस्थीकरण के साथ आगे बढ़ने का लक्ष्य भी प्राप्त करते हैं। इसी क्रम में गीता चिंतनिका और अर्थ-विवेचन जैसे प्रयासों ने पाठ को उसके जीवनगत अर्थ से जोड़ने का काम किया। यानी यात्रा केवल “श्लोक याद करने” की नहीं, बल्कि “श्लोक समझकर जीवन में उतारने” की दिशा में बढ़ती गई।
डिजिटल स्क्रीन से जन-जागरण तक : गीता मैत्री मिलन और सहस्र कण्ठनाद की प्रेरक गाथा
LearnGeeta का उपक्रम आज केवल ऑनलाइन कक्षाओं तक सीमित नहीं रह गया है। पिछले छह वर्षों में 182 देशों के 17 लाख से अधिक साधकों, 16,000 से अधिक स्वयंसेवकों तथा प्रतिदिन संचालित होने वाली लगभग 3,000 ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से संचालित यह साधना अब एक व्यापक सामाजिक चेतना का स्वरूप ग्रहण करती दिखाई दे रही है। आधुनिक तकनीक के माध्यम से आरम्भ हुआ यह प्रयास अब व्यक्ति के आत्म-विकास से आगे बढ़कर परिवार, समाज और राष्ट्र को जोड़ने वाली एक सशक्त सांस्कृतिक धारा बनता जा रहा है।
मार्च 2026 में धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र इसका एक ऐतिहासिक साक्षी बना। जिस पावन भूमि पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का अमर संदेश दिया था, वहीं ‘सहस्र गीता कण्ठनाद – राष्ट्र जागरण महायज्ञ’ में 11 देशों और भारत के 28 राज्यों से आए 1,500 से अधिक कंठस्थ ‘गीताव्रती’ साधक एकत्र हुए। हजारों कंठों से एक साथ गूँजते गीता श्लोकों ने केवल एक आध्यात्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता का अनुपम दृश्य उपस्थित किया। तीन किलोमीटर लंबी ‘लघु भारत’ शोभायात्रा, विविध प्रांतों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, संतों का पाथेय, 300 साधकों की गुरु-दीक्षा तथा हजारों श्रद्धालुओं की सहभागिता ने इस आयोजन को आधुनिक काल के विशिष्ट सांस्कृतिक अध्यायों में स्थान दिलाया।
यह विस्तार केवल ऑनलाइन नहीं है। ‘गीता मैत्री मिलन’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से देश-विदेश के साधकों को प्रत्यक्ष रूप से जोड़ने का प्रयास भी निरंतर बढ़ रहा है। भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, थाईलैंड और सिंगापुर जैसे देशों में आयोजित मिलनों ने साधकों के बीच आत्मीयता, सेवा और सांस्कृतिक बंधुत्व को सुदृढ़ किया है। इसी प्रेरणा से आज 10 भाषाओं में 300 से अधिक बाल संस्कार केन्द्र संचालित हो रहे हैं, जहाँ नई पीढ़ी को श्लोक-पाठ के साथ जीवन-मूल्य, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभाव का संस्कार दिया जा रहा है।
इस दृष्टि से गीता परिवार की यात्रा को केवल डिजिटल शिक्षा की कहानी कहना अधूरा होगा। यह एक ऐसी सतत प्रक्रिया है, जो व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज और समाज से व्यापक जनजागरण की ओर बढ़ती दिखाई देती है। जब 17 लाख से अधिक लोग एक साझा आध्यात्मिक सूत्र में जुड़ते हैं, 1,500 गीताव्रती कुरुक्षेत्र में एक स्वर से गीता का घोष करते हैं और सैकड़ों संस्कार केन्द्रों में नई पीढ़ी भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचित होती है, तब यह स्पष्ट होता है कि यह केवल अध्ययन का अभियान नहीं, बल्कि संस्कार, समन्वय और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की एक मौन किन्तु प्रभावशाली यात्रा है।
छत्तीसगढ़ में अंकुरित हो रहा गीता-आधारित सामाजिक नवजागरण
यदि ‘लर्न गीता’ (LearnGeeta) अभियान की वैश्विक प्रतिध्वनि को निकट से सुनना हो, तो उसकी सबसे जीवंत झलक छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर दिखाई देती है। पिछले कुछ वर्षों में रायपुर, दुर्ग, भिलाई, बिलासपुर, राजनांदगांव, रायगढ़, धमतरी, कांकेर, बेमेतरा, दंतेवाड़ा और जगदलपुर जैसे अंचलों से हर वर्ग के लोग—चाहे वे गृहस्थ हों, विद्यार्थी या वरिष्ठ नागरिक अध्यात्म और संस्कारों की इस सुरसरि से निष्ठापूर्वक जुड़ रहे हैं। यह सहभागिता केवल डिजिटल स्क्रीन तक सीमित नहीं, बल्कि एक मौन सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण का रूप ले चुकी है।
छत्तीसगढ़ में इस अभियान की यात्रा केवल श्लोक-उच्चारण तक सीमित न रहकर जीवन-मूल्यों को गढ़ने का माध्यम बनी है। वर्तमान में प्रदेश भर में 20 बाल संस्कार केंद्र संचालित हैं, जहाँ नन्हे बालकों को श्लोक-पाठ के साथ चरित्र निर्माण, अनुशासित जीवन और नैतिक मूल्यों का संस्कार दिया जा रहा है। इसके साथ ही, प्रदेश के लगभग 15 विद्यालयों में नियमित गीता एवं संस्कार कक्षाएं संचालित हो रही हैं, जो विद्यार्थियों में एकाग्रता, कर्तव्यबोध और निर्णय-क्षमता का बीजारोपण कर रही हैं। हाल ही में दुर्ग और बिलासपुर के ग्रीष्मकालीन शिविरों में 250 से अधिक बालकों ने योग, कथा, आत्मरक्षा और क्रीड़ा के माध्यम से भारतीय जीवन-दर्शन को आत्मसात किया। आगामी समय में रायपुर सहित प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे शिविरों के विस्तार की योजना है।
इस नवजागरण का सबसे मार्मिक और प्रेरणादायी अध्याय प्रदेश के कारागारों में लिखा जा रहा है। वर्तमान में 300 से अधिक बंदी नियमित रूप से गीता-अध्ययन से जुड़कर आत्म-संशोधन के मार्ग पर अग्रसर हैं। रायपुर केंद्रीय कारागार का एक उदाहरण अनुकरणीय है, जहाँ आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक बंदी ने आत्मचिंतन की साधना से संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता को कंठस्थ कर ‘गीता-व्रती’ का गौरव प्राप्त किया। यह घटना सिद्ध करती है कि परिस्थितियों के अंधकार में भी गीता आंतरिक रूपांतरण का अमर आलोक जला सकती है। बिलासपुर, कवर्धा , धमतरी गरियाबंद के जेलो मे कक्षाएं आरंभ है। रायगढ़ , कोरबा ,मुंगेली और अंबिकापुर में प्रारंभ होने को है। आज छत्तीसगढ़ में ऐसे 25 से अधिक ‘गीता-व्रती’ हैं, जिन्होंने संपूर्ण गीता को अपने कंठ में बसाया है।
लोकसंस्कृति, सेवा और सामुदायिक समरसता की समृद्ध परंपरा वाले छत्तीसगढ़ में यह अभियान तकनीक और परंपरा के बीच एक सुंदर सेतु निर्मित कर रहा है। एक ओर आधुनिक डिजिटल माध्यम है, तो दूसरी ओर सनातन जीवन-मूल्य। इस अद्भुत समन्वय से निर्मित हो रहा वातावरण नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए आधुनिक युग की चुनौतियों से लड़ने का संबल दे रहा है।
श्रीकृष्ण को बुलाना है तो गीता का द्वार खोलना होगा
कृष्ण जन्माष्टमी हर वर्ष आती है, दीप जलते हैं, मंदिर सजते हैं, भजन गूँजते हैं और हम श्रद्धा से नंदलाल का स्वागत करते हैं। किंतु शायद इस पर्व का सबसे गहरा प्रश्न यह है कि क्या श्रीकृष्ण केवल हमारे उत्सवों में हैं, या हमारे विचारों, निर्णयों और जीवन-दृष्टि में भी?
आज जब दुनिया अनिश्चितताओं से घिरी है, परिवार संवाद की तलाश में हैं और नई पीढ़ी दिशा खोज रही है, तब गीता का प्रकाश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। यह हमें संसार से भागना नहीं सिखाती, बल्कि उसके बीच रहकर संतुलन, साहस, कर्तव्य और करुणा के साथ जीना सिखाती है।
इस जन्माष्टमी पर शायद सबसे सुंदर संकल्प यही हो सकता है कि हम अपने जीवन में गीता के लिए एक छोटा-सा स्थान बनाएं। प्रतिदिन कुछ मिनट, एक श्लोक, एक विचार, एक प्रेरणा—और फिर उस प्रकाश को अपने परिवार, अपने बच्चों और अपने आसपास के लोगों तक पहुँचाएं। क्योंकि परिवर्तन बड़े मंचों से नहीं, घरों के छोटे-छोटे दीपों से आरम्भ होता है।
हो सकता है आने वाले समय में समाज को बदलने वाली सबसे बड़ी शक्ति कोई नई तकनीक या व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कारों से प्रकाशित मनुष्य ही सिद्ध हो। और उस परिवर्तन की शुरुआत शायद वहीं से हो, जब किसी घर में पहली बार गीता खुले, कोई बालक पहला श्लोक सीखे, कोई युवा उसमें अपने प्रश्नों का उत्तर खोजे और कोई परिवार उसे अपने जीवन का पथप्रदर्शक बना ले।
आइए, इस जन्माष्टमी पर केवल श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव न मनाएँ, बल्कि उनके संदेश को भी अपने जीवन में जन्म दें। इसी संकल्प को आगे बढ़ाने का एक सुंदर अवसर सामने है। वर्ष 2020 में आरम्भ हुई LearnGeeta की यात्रा अब अपने 50वें Golden Batch की ओर बढ़ रही है। 49 बैचों के माध्यम से देश-विदेश के लाखों साधक गीता के अध्ययन से जुड़े हैं। आगामी 16 अक्टूबर 2026 को Golden Batch की Welcome Ceremony होगी और 19 अक्टूबर से नियमित कक्षाएँ प्रारम्भ होंगी।
इससे जुड़ना भी अत्यंत सरल है। न संस्कृत का पूर्वज्ञान आवश्यक है, न किसी विशेष योग्यता की जरूरत। निःशुल्क ऑनलाइन कक्षाएँ सोमवार से शुक्रवार, प्रतिदिन लगभग 40 मिनट की होती हैं। अपनी सुविधानुसार भाषा और समय चुनकर इन कक्षाओं से जुड़ा जा सकता है। इस जन्माष्टमी अपने घर में गीता का द्वार खोलिए और श्रीकृष्ण के संदेश को अपने जीवन में आमंत्रित कीजिए। 50वें Golden Batch के लिए पंजीकरण हेतु https://setu.learngeeta.com/watch/73970 या joingeeta.com पर जाएँ।
क्योंकि परिवर्तन बड़े मंचों से नहीं, घरों के छोटे-छोटे दीपों से आरम्भ होता है। हो सकता है, आपके घर में खुलने वाली गीता का पहला पृष्ठ ही किसी नए संस्कार, किसी नई दिशा और किसी नए जीवन-प्रकाश की शुरुआत बन जाए।




