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“दिव्यांग कोटे में खेल या कागज़ी खानापूर्ति?”

RTI में सामने आई सूची ने खड़े किए कई सवाल, दो साल में बदली जानकारी से बढ़ा संदेह

घरघोड़ा, रायगढ़।सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों ने विकासखंड शिक्षा कार्यालय घरघोड़ा में दिव्यांग कोटे से हुई नियुक्तियों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनसूचना अधिकारी द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी में ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनसे पूरे मामले में लीपापोती और तथ्य छुपाने की आशंका जताई जा रही है।

RTI आवेदक को उपलब्ध कराई गई सूची में विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय घरघोड़ा अंतर्गत दिव्यांग कोटे से नियुक्त 6 अधिकारियों/कर्मचारियों के नाम दिए गए हैं। सूची में किसी को दृष्टि बाधित तो अधिकांश को अस्थि बाधित बताया गया है। साथ ही दिव्यांग प्रमाण पत्र जिला मेडिकल बोर्ड रायगढ़ से जारी होना दर्शाया गया है।

लेकिन पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि RTI आवेदन में स्पष्ट रूप से “नियुक्ति के समय प्रस्तुत दिव्यांग प्रमाण पत्र की प्रमाणित प्रति” मांगी गई थी, परंतु विभाग द्वारा वह दस्तावेज उपलब्ध ही नहीं कराया गया।

“सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब क्यों?”

सूचना अधिकार आवेदन में नियुक्ति के समय जमा किए गए मूल दिव्यांग प्रमाण पत्रों की प्रमाणित प्रतिलिपि मांगी गई थी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि संबंधित कर्मचारियों की नियुक्ति किस आधार पर हुई और प्रमाण पत्र वैध थे या नहीं।

लेकिन जनसूचना अधिकारी द्वारा केवल  कुछ नामों की सूची उपलब्ध कराकर मूल प्रश्न को ही नजरअंदाज कर दिया गया। इससे अब कई सवाल खड़े हो गए हैं—

क्या विभाग के पास रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं?

क्या प्रमाण पत्रों में कोई गड़बड़ी है?

क्या जानबूझकर दस्तावेज छुपाए जा रहे हैं?

आखिर सबसे अहम दस्तावेज देने से परहेज क्यों किया गया?

“दो साल पहले कुछ और, अब कुछ और?”

सूत्रों के अनुसार, इसी विषय पर पूर्व में मांगी गई जानकारी और वर्तमान RTI जवाब में कई बिंदुओं पर बदलाव दिखाई दे रहा है। आरोप है कि पहले विभाग द्वारा जो जानकारी दी गई थी, उसमें कुछ नाम अथवा विवरण अलग थे, जबकि अब नई सूची प्रस्तुत की गई है।

यहीं से संदेह गहराने लगा है कि:

क्या विभाग रिकॉर्ड बदलकर जानकारी दे रहा है?

क्या वास्तविक अभिलेखों को छुपाया जा रहा है?

क्या किसी को बचाने का प्रयास हो रहा है?

या फिर पहले गलत जानकारी दी गई थी?

यदि दो अलग-अलग समय में एक ही विषय पर अलग-अलग तथ्य दिए गए हैं, तो यह सीधे तौर पर RTI Act की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

⚖️ “गलत और अधूरी जानकारी देना कानून का उल्लंघन”

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जनसूचना अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वह मांगी गई जानकारी पूर्ण, सही और अभिलेख आधारित उपलब्ध कराए। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज — दिव्यांग प्रमाण पत्र की प्रमाणित प्रति — ही उपलब्ध नहीं कराई गई।

कानूनी जानकारों के अनुसार यदि जानबूझकर जानकारी रोकी गई या भ्रामक जवाब दिया गया हो, तो संबंधित अधिकारी पर RTI Act की धारा 20 के तहत कार्रवाई संभव है।

“फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र का एंगल भी चर्चा में”

क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं दिव्यांग कोटे का लाभ लेने के लिए कागजी प्रमाणपत्रों का उपयोग तो नहीं किया गया। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन RTI में विरोधाभासी एवं अधूरी जानकारी मिलने के बाद पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है।

“सूचना छुपाने की कोशिश?”

RTI कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि विभाग के पास रिकॉर्ड स्पष्ट हैं, तो प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध क्यों नहीं कराई गईं? इससे प्रथम दृष्टया तथ्य छुपाने और जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने की आशंका मजबूत होती है।

अब मांग उठ रही है कि:

सभी दिव्यांग नियुक्तियों की जांच हो,

नियुक्ति के समय जमा दिव्यांग प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराया जाए,

आरक्षण रोस्टर की जांच हो,

और गलत जानकारी देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।

आगे क्या?

सूत्रों के अनुसार, मामले को लेकर प्रथम अपील एवं राज्य सूचना आयोग में शिकायत की तैयारी की जा रही है। साथ ही दस्तावेजों के सत्यापन एवं नियुक्तियों की वैधता की जांच की मांग भी उठ सकती है।

यदि मामले की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह केवल RTI विवाद नहीं बल्कि “दिव्यांग कोटे में संभावित बड़े फर्जीवाड़े” का खुलासा भी बन सकता है।

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