नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी में बड़ा उलटफेर! सोमवार को हुए निर्विरोध चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नितिन नबीन को 12वें राष्ट्रीय अध्यक्ष की कमान सौंपी। मात्र 44 साल की उम्र में वे भाजपा के इतिहास के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं। चुनाव शेड्यूल जारी होते ही बधाइयों का दौर शुरू हो गया था, जो अब औपचारिक रूप ले चुका है।
परिवार की विरासत से राजनीति में कूदे ‘लो-प्रोफाइल’ योद्धा
नितिन नबीन का सफर किसी फिल्मी कहानी जैसा है। 2006 में पिता और बिहार के पूर्व विधायक नवीन किशोर सिन्हा के निधन के बाद, 26 साल के नितिन ने पढ़ाई छोड़कर पटना पश्चिम उपचुनाव लड़ा और भारी बहुमत से जीत हासिल की। उसके बाद बांकीपुर सीट से लगातार जीतते रहे। ABVP से शुरू किया संघ परिवार का सफर, फिर भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री बने। 2021 से छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहे, जहां 2023 विधानसभा चुनाव में भाजपा की जबरदस्त जीत का श्रेय उन्हें भी मिला। नीतीश सरकार में मंत्री बने, फिर छत्तीसगढ़ फोकस। कायस्थ समाज से ताल्लुक रखने वाले नितिन की सादगी और संगठनात्मक दमखम पार्टी आलाकमान को भाता रहा।

छत्तीसगढ़ कनेक्शन: स्थानीय जमीनी कार्यकर्ता का राष्ट्रीय उभार
छत्तीसगढ़ के लिए यह नियुक्ति खास है। 2021 से मध्य भारत प्रभारी के तौर पर नितिन ने यहां संगठन को मजबूत किया। 2023 की ऐतिहासिक जीत के बाद वे राज्य के एकमात्र प्रभारी बने। उनकी रणनीति ने भाजपा को मजबूत आधार दिया। अब राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर वे छत्तीसगढ़ की राजनीति पर और नजर रखेंगे, खासकर आगामी चुनौतियों के बीच।

बंगाल चुनाव में मास्टरस्ट्रोक: कायस्थ वोटबैंक पर निशाना
2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह फैसला स्ट्रैटेजिक लगता है। बंगाल में 27 लाख कायस्थ (2.7% आबादी) हैं- शिक्षित, प्रशासनिक और साहित्यिक रूप से प्रभावशाली। यहां ज्योति बसु और चटर्जी जैसे कायस्थ सीएम रह चुके। बिहार-यूपी के बाद बंगाल में उनकी अच्छी पकड़ है। नितिन की नियुक्ति से भाजपा बंगाल में जातिगत संतुलन बनाने की कोशिश में लगी दिख रही। यह उत्तराधिकार नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन का संदेश है।

नितिन नबीन की शांत शैली, चुनावी रिकॉर्ड और युवा ऊर्जा भाजपा के ‘नवीन युग’ की शुरुआत का प्रतीक बनेगी। क्या यह कदम विपक्ष को चौंका देगा?


