“शिक्षकों को पढ़ाने तो दो हुजूर…..”
मुंगेली।शालेय शिक्षक संघ ने छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग के ई-अटेंडेंस पायलट प्रोजेक्ट के तहत शिक्षकों को निजी मोबाइल पर VSK ऐप डाउनलोड करने के लिए मजबूर करने पर सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि यह शिक्षकों की निजता का उल्लंघन है और डेटा लीक, डीप फेक तथा AI के दुरुपयोग जैसे साइबर खतरों को बढ़ावा दे सकता है। संघ ने विभाग से इस प्रोजेक्ट को तत्काल बंद करने की मांग की है।
VSK ऐप और ई-अटेंडेंस का विवाद
विद्या समीक्षा केंद्र (VSK) छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग की एक डेटा-आधारित पहल है, जो स्कूलों की निगरानी और सुधार के लिए AI तथा रीयल-टाइम डेटा का उपयोग करती है। इस ऐप को शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए लॉन्च किया गया है, लेकिन संघ के जिलाध्यक्ष दीपक वेंताल ने इसे अनावश्यक बताते हुए कहा कि निजी मोबाइल पर ऐप इंस्टॉल करने से कैमरा, लोकेशन और डेटा एक्सेस की अनुमति मिल जाती है, जो पारिवारिक असुरक्षा पैदा कर सकता है। उन्होंने मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री से हस्तक्षेप की अपील की है।संगठन के अनुसार, नेटवर्क और सर्वर समस्याओं से जूझते स्कूलों में यह ऐप अप्रासंगिक है, खासकर दूरस्थ क्षेत्रों में जहां कनेक्टिविटी की कमी रहती है।श्री वेंताल ने जोर देकर कहा कि विभाग के पास खुद कोई तंत्र न होने पर शिक्षकों के निजी संसाधनों का दुरुपयोग गलत है।ई अटेंडेंस के इस पायलट प्रोजेक्ट को तत्काल निरस्त करे।
विभाग पर भरोसे की कमी?
शालेय शिक्षक संघ के जिला सचिव नेमीचंद भास्कर ने पूछा कि क्या विभाग को CAC, BRCC, ABEO, BEO जैसे अधिकारियों पर भरोसा नहीं है, जिसके कारण ऐप के जरिए निगरानी जरूरी हो गई? उन्होंने कहा कि यह प्रयोग शिक्षकों पर दबाव डालकर लागू किया जा रहा है, जबकि असफलताओं की जिम्मेदारी कभी अधिकारियों पर नहीं ली जाती। भास्कर ने अनावश्यक ऑनलाइन कार्यों की भरमार पर नाराजगी जताई और पाठन कार्य पर फोकस करने की सलाह दी।
साइबर जोखिम और संवैधानिक उल्लंघन
संगठन के ब्लॉक अध्यक्ष दुर्गेश देवांगन, गुनाराम निर्मलकर और विवेक गोविन्द ने बताया कि मोबाइल शिक्षक की निजी संपत्ति है, जिसमें पारिवारिक फोटो, बैंक डिटेल्स जैसी संवेदनशील जानकारी होती है। ऐप डाउनलोड कराना संविधान के निजता अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने दूरस्थ इलाकों में नेटवर्क इश्यू का हवाला देते हुए प्रोजेक्ट बंद करने की मांग दोहराई।
शिक्षा विभाग के लगातार प्रयोगों से शिक्षकों पर बोझ बढ़ रहा है, जबकि गुणवत्ता सुधार की बातें खोखली साबित हो रही हैं।


